
शाम होने में अभी कुछ घंटे बाकी थे।
पूरा शेखावत मेंशन तैयारियों में डूबा हुआ था।
गार्डन को सफेद और सुनहरी लाइटों से सजाया जा रहा था।
रंग-बिरंगे ताज़ा फूलों की खुशबू पूरे माहौल को महका रही थी।
सर्वेंट्स इधर-उधर भागते हुए हर इंतज़ाम पूरा करने में लगे थे।
गौरी हर छोटी-बड़ी चीज़ खुद देख रही थीं।
"धारा बेटा, ये फूल स्टेज के पास रखवा दो।"
"जी आंटी।"
धारा मुस्कुराकर फूलों की टोकरी उठाकर आगे बढ़ गई।
उधर दूसरी तरफ...
अर्णव भी नीचे आ चुका था।
उसकी तेज़ नीली आँखें पूरे गार्डन का बारीकी से निरीक्षण कर रही थीं।
उसने एक नज़र में ही समझ लिया...
कि सुरक्षा में कुछ कमियाँ थीं।
उसने अपनी घड़ी में लगे छोटे-से कम्युनिकेशन डिवाइस को ऑन किया।
"Victor."
"Yes Boss."
"Outer wall पर चार और स्नाइपर चाहिए।"
"Done."
"Roof security double कर दो।"
"Already on it."
"कोई भी अनजान आदमी इस मेंशन के सौ मीटर के अंदर नहीं आना चाहिए।"
"Understood, Boss."
कॉल खत्म होते ही अर्णव की नज़र फिर धारा पर पड़ी।
वह सीढ़ी पर खड़ी होकर फूलों की झालर बाँधने की कोशिश कर रही थी।
लेकिन ऊँचाई ज़्यादा होने की वजह से उसका संतुलन बिगड़ गया।
"धारा... संभलकर!"
आरोही की घबराई हुई आवाज़ निकली।
सीढ़ी अचानक हिल गई।
धारा का पैर फिसला।
वह नीचे गिरने ही वाली थी...
कि अगले ही पल...
एक मजबूत बाँह ने उसकी कमर थाम ली।
धारा की आँखें डर से बंद थीं।
कुछ सेकंड बाद जब उसने धीरे-धीरे आँखें खोलीं...
तो खुद को अर्णव की बाँहों में पाया।
दोनों की नज़रें एक-दूसरे से मिलीं।
समय जैसे फिर से थम गया।
धारा की साँसें तेज़ हो गईं।
अर्णव का चेहरा हमेशा की तरह शांत था...
लेकिन उसकी पकड़ अब भी ढीली नहीं हुई थी।
"अब ठीक हो?"
उसने पहली बार धीमी आवाज़ में पूछा।
धारा ने बिना कुछ बोले सिर हिला दिया।
अर्णव ने तुरंत उसे सीधा खड़ा किया और एक कदम पीछे हट गया।
तभी...
"वाह!"
पार्थ ज़ोर से ताली बजाते हुए बोला,
"आज तो भाई रिकॉर्ड पर रिकॉर्ड बना रहे हैं।"
वायु भी हँस पड़ा।
"पहले हाथ पकड़ा... अब कमर भी पकड़ ली।"
धारा शर्म से लाल पड़ गई।
"भैया!"
आरोही ने दोनों को डाँटा।
गौरी ने भी गुस्से से देखा।
"तुम दोनों कभी नहीं सुधरोगे।"
अर्णव ने दोनों भाइयों की तरफ़ बस एक ठंडी नज़र डाली।
इतनी ठंडी...
कि दोनों तुरंत चुप हो गए।
लेकिन उनके चेहरे की मुस्कान अब भी नहीं गई थी।
उसी समय...
अर्णव की घड़ी में लगा कम्युनिकेटर हल्का-सा वाइब्रेट हुआ।
उसने बिना किसी को बताए कॉल रिसीव किया।
"Boss..."
"Speak."
"Suspicious movement."
अर्णव का चेहरा एकदम गंभीर हो गया।
"Location?"
"North boundary."
"मैं आ रहा हूँ।"
उसने बिना कुछ कहे गार्डन से बाहर कदम बढ़ा दिए।
धारा ने उसे जाते हुए देखा।
उसके मन में न जाने क्यों एक अजीब-सी बेचैनी होने लगी।
...
मेंशन की south दीवार के पास...
चार ब्लैक यूनिफॉर्म पहने गार्ड पहले से मौजूद थे।
अर्णव वहाँ पहुँचा।
"क्या हुआ?"
एक गार्ड आगे बढ़ा।
"सर, CCTV में पाँच मिनट पहले एक नकाबपोश आदमी दिखाई दिया था।"
"अब कहाँ है?"
"गायब हो गया।"
अर्णव ने बिना कुछ कहे आसपास नज़र दौड़ाई।
ज़मीन पर उसे जूतों के ताज़ा निशान दिखाई दिए।
वह झुककर उन्हें देखने लगा।
उसकी आँखों में खतरनाक चमक उतर आई।
"वो यहीं था..."
"और अभी भी आसपास ही है।"
उसी पल...
कुछ दूरी पर झाड़ियों के पीछे छिपा वही आदमी सब कुछ देख रहा था।
उसने धीरे से अपने ईयरपीस में कहा,
"Boss..."
"Target is more dangerous than we expected."
दूसरी तरफ़ से वही भारी आवाज़ आई—
"कोई जल्दबाज़ी मत करना।"
"अभी सिर्फ़ देखो..."
"समय आने पर वार करेंगे।"
"Yes Boss."
वह आदमी धीरे-धीरे अँधेरे में गायब हो गया।
लेकिन जाते-जाते...
उसकी नज़र एक बार फिर गार्डन में खड़ी धारा पर पड़ी।
उसके होंठों पर हल्की मुस्कान आ गई।
"तो... यही है।"
"शायद यही उसकी कमजोरी बन सकती है..."
उसे नहीं पता था...
कि अर्णव ने दूर से ही उसकी परछाईं देख ली थी।
अर्णव की नीली आँखें बर्फ़ की तरह ठंडी हो गईं।
उसने मन ही मन कहा,
"गलती कर दी तुमने..."
"मेरे घर तक आने की।"
और उसी पल...
शेखावत मेंशन के बाहर...
एक ऐसी खामोश जंग शुरू हो चुकी थी...
जिसकी पहली गोली अभी चली भी नहीं थी...
लेकिन दोनों पक्ष जीतने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार थे।
सूरज धीरे-धीरे west की ओर ढलने लगा था।
कुछ ही घंटों में पूरा शेखावत मेंशन रोशनी से जगमगाने लगा।
सफेद और सुनहरी फेयरी लाइट्स पूरे गार्डन को किसी महल जैसा बना रही थीं।
हल्का-हल्का संगीत बज रहा था।
मेहमान भी एक-एक करके आने लगे थे।
शिव और गौरी सभी मेहमानों का मुस्कुराकर स्वागत कर रहे थे।
पार्थ और वायु अपनी आदत के मुताबिक पूरे माहौल में हँसी-मज़ाक घोल रहे थे।
उधर...
धारा अपने कमरे में तैयार हो रही थी।
आज उसने हल्के गुलाबी रंग का खूबसूरत अनारकली सूट पहना था, जिस पर चाँदी की महीन कढ़ाई चमक रही थी।
उसके लंबे काले रेशमी बाल खुले थे।
हल्का-सा मेकअप, गुलाबी होंठ और बड़ी-बड़ी काली आँखें...
उसे किसी अप्सरा से कम नहीं दिखा रही थीं।
जैसे ही वह सीढ़ियों से नीचे उतरी...
पूरे हॉल की नज़रें कुछ पल के लिए उसी पर ठहर गईं।
आरोही मुस्कुरा उठी।
"वाह धारा... आज तो तुम सच में बहुत सुंदर लग रही हो।"
गौरी ने प्यार से उसकी नज़र उतारी।
"मेरी बच्ची को किसी की नज़र न लगे।"
धारा हल्का-सा मुस्कुरा दी।
उसी समय...
मुख्य दरवाज़े से अर्णव अंदर आया।
आज उसने ब्लैक थ्री-पीस सूट पहन रखा था।
उसकी नीली आँखें हमेशा की तरह ठंडी थीं...
लेकिन जैसे ही उसकी नज़र धारा पर पड़ी...
उसके कदम एक पल के लिए वहीं रुक गए।
धारा भी अनजाने में उसकी ओर देखने लगी।
कुछ सेकंड...
दोनों बस एक-दूसरे को देखते रहे।
आसपास की आवाज़ें जैसे उनके लिए गायब हो गई थीं।
अर्णव ने पहली बार महसूस किया...
कि किसी एक चेहरे से नज़र हटाना उसके लिए मुश्किल हो रहा था।
अगले ही पल उसने खुद को संभाला और बिना कोई भाव दिखाए दूसरी तरफ़ देखने लगा।
लेकिन यह छोटा-सा पल...
पार्थ और वायु की नज़रों से छिप नहीं पाया।
दोनों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा और शरारती मुस्कान दबा ली।
...
इसी बीच...
मेंशन से लगभग दो सौ मीटर दूर...
एक काली एसयूवी अँधेरे में खड़ी थी।
उसके अंदर बैठा वही नकाबपोश आदमी दूरबीन से पार्टी देख रहा था।
उसने धीरे से कहा,
"Target surrounded by family."
फिर उसकी नज़र धारा पर पड़ी।
"यही लड़की है..."
उसने तुरंत अपने बॉस को मैसेज भेजा।
Target's possible weakness identified.
कुछ ही सेकंड बाद जवाब आया—
Keep watching. Don't attack yet.
वह हल्का-सा मुस्कुराया।
"Soon..."
...
उधर...
अर्णव अचानक भीड़ से अलग होकर अपनी घड़ी पर नज़र डालने लगा।
एक सिक्योरिटी अलर्ट चमक रहा था।
Unknown Signal Detected.
उसकी आँखें सिकुड़ गईं।
उसने बिना किसी को बताए ब्लूटूथ ईयरपीस लगाया।
"Victor."
"Yes Boss."
"Signal traced?"
"Not yet... लेकिन कोई हमारे सिक्योरिटी नेटवर्क को स्कैन करने की कोशिश कर रहा है।"
"Block every access."
"Done."
"और..."
अर्णव की नज़र फिर धारा पर गई, जो गौरी के साथ मेहमानों से बात कर रही थी।
उसने धीमी लेकिन बेहद ठंडी आवाज़ में कहा,
"धारा पर चौबीस घंटे नज़र रखो।"
कुछ पल के लिए दूसरी तरफ़ भी खामोशी छा गई।
फिर विक्टर बोला,
"Boss... क्या आपको लगता है कि दुश्मन—"
"मैंने जो कहा है... बस वही करो।"
"Yes Boss."
कॉल कट गई।
अर्णव ने गहरी साँस ली।
वह खुद नहीं समझ पा रहा था...
कि वह धारा की सुरक्षा के लिए इतना बेचैन क्यों हो रहा था।
लेकिन उसके भीतर का हर एहसास एक ही बात कह रहा था...
तूफ़ान बहुत करीब है।
और उस तूफ़ान का पहला निशाना...
शायद धारा बनने वाली थी।
उसी समय...
गार्डन में पार्टी पूरे शबाब पर थी।
हल्की ठंडी हवा चल रही थी।
चारों तरफ़ हँसी-मज़ाक और बातचीत की आवाज़ें गूँज रही थीं।
स्टेज पर एक लाइव बैंड धीमा रोमांटिक संगीत बजा रहा था।
तभी...
शिव ने माइक हाथ में लिया।
"आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद कि आप आज हमारी वेडिंग एनिवर्सरी और अर्णव के भारत लौटने की खुशी में शामिल हुए।"
तालियों की गड़गड़ाहट पूरे गार्डन में गूँज उठी।
गौरी मुस्कुराते हुए शिव के पास आकर खड़ी हो गईं।
दोनों ने मिलकर केक काटा।
सभी ने ज़ोरदार तालियाँ बजाईं।
पार्थ ने सबसे पहले केक का एक बड़ा टुकड़ा उठाकर शिव के मुँह में रख दिया।
"हैप्पी एनिवर्सरी, पापा!"
वायु ने हँसते हुए गौरी को केक खिलाया।
"अब mom की बारी।"
पूरा माहौल हँसी से भर गया।
धारा दूर खड़ी यह सब देखकर मुस्कुरा रही थी।
उसकी आँखों में एक हल्की-सी उदासी भी थी।
उसे अपने माता-पिता की याद आ गई।
उसने चुपचाप अपनी नज़रें झुका लीं।
लेकिन...
दूर खड़ा अर्णव उसकी आँखों में आए उस एक पल के खालीपन को भी पढ़ चुका था।
वह कुछ कदम उसकी तरफ़ बढ़ा ही था...
कि अचानक—
पूरे मेंशन की सारी लाइटें एक साथ बंद हो गईं।
पूरा गार्डन घने अँधेरे में डूब गया।
कुछ महिलाओं की घबराई हुई चीखें सुनाई दीं।
"क्या हुआ?"
"लाइट कैसे चली गई?"
"गार्ड!"
अर्णव की आवाज़ बिजली की तरह गूँजी—
"Nobody move!"
उसकी आवाज़ में ऐसा अधिकार था कि घबराए हुए लोग भी वहीं रुक गए।
अगले ही पल...
उसने अपने ईयरपीस में कहा,
"Victor!"
"Boss... यह पावर फेलियर नहीं है।"
"किसी ने जानबूझकर मेन लाइन जाम की है।"
अर्णव की आँखें खतरनाक हो गईं।
"Emergency backup."
"Starting in five seconds."
उसी पल...
अँधेरे का फायदा उठाकर...
एक काली परछाईं भीड़ के बीच से तेजी से आगे बढ़ी।
उसकी नज़र सिर्फ़ एक इंसान पर थी...
धारा।
धारा कुछ समझ पाती...
उससे पहले किसी ने पीछे से उसका मुँह दबा लिया।
वह घबरा गई।
उसने छूटने की पूरी कोशिश की...
लेकिन उस आदमी की पकड़ बेहद मज़बूत थी।
उसी क्षण...
अर्णव को अचानक बेचैनी हुई।
उसका दिल ज़ोर से धड़का।
जैसे किसी अनजान खतरे ने उसे चेतावनी दी हो।
उसने बिना एक पल गंवाए ज़ोर से पुकारा—
"धारा!"
लेकिन कोई जवाब नहीं आया।
अर्णव का चेहरा एक पल में बदल गया।
उसकी नीली आँखों में अब सिर्फ़ एक चीज़ थी...
खून।
"Victor!"
"Boss!"
"धारा दिखाई नहीं दे रही।"
दूसरी तरफ़ कुछ सेकंड की खामोशी रही।
फिर विक्टर की घबराई आवाज़ आई—
"Boss... CCTV feed भी बंद हो चुकी है!"
अर्णव की मुट्ठियाँ कस गईं।
अगले ही पल...
पूरे मेंशन की बैकअप लाइटें एक साथ जल उठीं।
रोशनी लौटते ही...
सभी की नज़रें इधर-उधर दौड़ने लगीं।
लेकिन...
धारा वहाँ नहीं थी।
गौरी घबराकर चिल्लाईं—
"धारा...!"
आरोही की आँखों में आँसू आ गए।
"दीदी कहाँ हैं?"
पार्थ और वायु भी चारों तरफ़ भागने लगे।
लेकिन...
अर्णव बिल्कुल शांत खड़ा था।
इतना शांत...
कि उसे देखने वाला कोई भी इंसान डर जाए।
उसने धीरे-धीरे अपनी घड़ी का एक छिपा हुआ बटन दबाया।
अगले ही पल...
मेंशन के हर गेट पर लगे स्टील बैरियर ज़ोरदार आवाज़ के साथ बंद हो गए।
पूरा शेखावत मेंशन लॉकडाउन मोड में चला गया।
अर्णव की बर्फ़ जैसी ठंडी आवाज़ पूरे गार्डन में गूँजी—
"जिसने भी उसे छूने की कोशिश की है..."
"आज उसकी आख़िरी रात होगी।"
और उसी पल...
दूर अँधेरे में...
एक काली परछाईं धारा को लेकर भाग रही थी।
लेकिन उसे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था...
कि उसने दुनिया के सबसे खतरनाक इंसान की एकमात्र अनमोल चीज़ को छू लिया है।
और अब...
उसका बचकर निकलना लगभग नामुमकिन था।
अगले ही पल...
पूरा शेखावत मेंशन युद्धभूमि में बदल चुका था।
सायरन की तेज़ आवाज़ पूरे इलाके में गूँजने लगी।
चारों दिशाओं से ब्लैक कॉम्बैट यूनिफॉर्म पहने गार्ड अपनी-अपनी पोज़िशन पर पहुँच गए।
अर्णव की आँखों में अब कोई भावना नहीं थी...
सिर्फ़ मौत जैसी ठंडी खामोशी।
उसने ईयरपीस में आदेश दिया—
"Victor."
"Yes, Boss."
"पूरे एरिया को सील कर दो।"
"एक भी गाड़ी... एक भी बाइक... और एक भी इंसान बिना चेक किए इस इलाके से बाहर नहीं जाना चाहिए।"
"Already done, Boss."
"Drone Team?"
"Airborne."
"Thermal Scan?"
"Running."
अर्णव ने बिना समय गंवाए अपनी जैकेट के अंदर से एक कॉम्पैक्ट पिस्टल निकाली और कमर के पीछे लगा ली।
उसकी नज़र सामने मिट्टी पर पड़े हल्के जूतों के निशानों पर गई।
वह घुटनों के बल बैठ गया।
कुछ सेकंड तक निशानों को ध्यान से देखने के बाद उसकी ठंडी आवाज़ निकली—
"दो लोग..."
"एक ने धारा को उठाया..."
"दूसरा रास्ता साफ़ कर रहा था।"
पास खड़े सभी गार्ड हैरान रह गए।
उन्होंने तो अभी तक सिर्फ़ पैरों के निशान देखे थे...
लेकिन अर्णव उन निशानों से पूरी घटना पढ़ चुका था।
तभी...
विक्टर की आवाज़ फिर सुनाई दी।
"Boss!"
"हमें मेंशन की पिछली दीवार के पास एक बेहोश गार्ड मिला है।"
"ज़िंदा है?"
"Yes."
"उसके पास से एक स्मोक ग्रेनेड भी मिला है।"
अर्णव की आँखें सिकुड़ गईं।
"मैं वहीं आ रहा हूँ।"
...
उधर...
धारा की धीरे-धीरे आँखें खुलने लगीं।
उसका सिर बुरी तरह भारी लग रहा था।
चारों तरफ़ अँधेरा था।
उसके हाथ पीछे की ओर बँधे हुए थे।
वह किसी बंद कमरे में कुर्सी से बंधी बैठी थी।
उसने घबराकर इधर-उधर देखने की कोशिश की।
तभी...
अँधेरे से एक आदमी बाहर आया।
चेहरे पर काला नकाब।
आँखों में खतरनाक चमक।
वह धारा के सामने आकर रुका।
"डरो मत..."
उसने धीमे से कहा।
"अगर अर्णव ने समझदारी दिखाई..."
"तो तुम्हें कुछ नहीं होगा।"
धारा ने गुस्से से उसकी तरफ़ देखा।
"तुम लोग हो कौन?"
वह आदमी हँस पड़ा।
"हम?"
"हम सिर्फ़ उसके अतीत का अधूरा हिसाब हैं।"
इतना कहकर वह बाहर चला गया।
धारा ने गहरी साँस ली।
डर तो उसे लग रहा था...
लेकिन उसने खुद को टूटने नहीं दिया।
उसने मन ही मन कहा—
"Ma kali... मुझे यकीन है... Aap मुझे बचा लोगी।"
...
उधर...
मेंशन के कंट्रोल रूम में...
सैकड़ों स्क्रीन एक साथ चल रही थीं।
अर्णव एक-एक फुटेज को ध्यान से देख रहा था।
अचानक...
एक स्क्रीन पर उसकी नज़र रुक गई।
सिर्फ़ आधे सेकंड की रिकॉर्डिंग।
अँधेरे में...
एक आदमी धारा को उठाकर ले जा रहा था।
लेकिन उसी फ्रेम में...
एक और चीज़ दिखाई दी।
उस आदमी की कलाई पर बना हुआ...
काले बिच्छू (Black Scorpion) का टैटू।
अर्णव की साँस एक पल के लिए थम गई।
उसकी आँखों में पहचान की चमक उभरी।
उसने बेहद ठंडी आवाज़ में कहा—
"Black Scorpion..."
विक्टर चौंक गया।
"Boss... क्या वही संगठन?"
अर्णव ने धीरे से सिर हिलाया।
"हाँ..."
"जिसे मैंने पाँच साल पहले खत्म समझ लिया था..."
" शायद अब ऑस्ट्रेलिया को छोड़कर इंडिया में आ गया है।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
कुछ सेकंड बाद...
अर्णव ने अपनी पिस्टल लोड की।
फिर अपनी नीली आँखों में मौत जैसी ठंडक लिए बोला—
"उन्होंने बहुत बड़ी गलती कर दी है।"
"इस बार..."
"मैं सिर्फ़ उनके बॉस को नहीं..."
"उनके नाम तक को इस दुनिया से मिटा दूँगा।"
उसी समय...
विक्टर के सिस्टम पर एक नया मैसेज आया।
Unknown Number
«अगर धारा को ज़िंदा देखना चाहते हो... तो अकेले आना।»
मैसेज के साथ एक लोकेशन भी भेजी गई थी।
अर्णव ने स्क्रीन पर नज़र टिकाए रखी।
उसके होंठों पर पहली बार एक बेहद खतरनाक मुस्कान उभरी।
"तुम्हें लगता है..."
"तुमने मेरे लिए जाल बिछाया है।"
उसने पिस्टल की मैगज़ीन लॉक की।
"लेकिन..."
"शिकार और शिकारी में फ़र्क सिर्फ़ इतना है..."
"कि तुम्हें अभी तक पता ही नहीं चला..."
"असल शिकारी कौन है।"
और उसी पल...
अर्णव अकेले उस लोकेशन की ओर निकल पड़ा...
जहाँ उसका सबसे बड़ा दुश्मन...
और धारा...
दोनों उसका इंतज़ार कर रहे थे।
रात पूरी तरह उतर चुकी थी।
काली Rolls-Royce Phantom सुनसान सड़क को चीरती हुई तेज़ रफ्तार से आगे बढ़ रही थी।
ड्राइविंग सीट पर अर्णव था।
उसका चेहरा बिल्कुल शांत था...
लेकिन उसकी बर्फ़ जैसी नीली आँखों में मौत साफ़ दिखाई दे रही थी।
ईयरपीस में अचानक विक्टर की आवाज़ गूँजी—
"Boss... हमने उस लोकेशन का सैटेलाइट स्कैन किया है।"
"Report."
"वह जगह पिछले दस साल से बंद पड़ी एक पुरानी टेक्सटाइल मिल है।"
"कम से कम तीस हथियारबंद लोग अंदर मौजूद हैं।"
"और..."
विक्टर कुछ पल के लिए रुक गया।
"पूरी बिल्डिंग में विस्फोटक भी लगाए गए हैं।"
अर्णव के चेहरे पर कोई बदलाव नहीं आया।
"Expected."
"Boss... यह साफ़-साफ़ ट्रैप है।"
"आप अकेले मत जाइए।"
कुछ सेकंड तक खामोशी रही।
फिर अर्णव बोला—
"अगर मैं पूरी टीम लेकर गया..."
"तो सबसे पहले धारा मारी जाएगी।"
"लेकिन अगर मैं अकेला गया..."
"तो उन्हें लगेगा कि उनका प्लान काम कर गया।"
उसकी आवाज़ पहले से भी ठंडी हो गई।
"और वहीं..."
"वे अपनी सबसे बड़ी गलती करेंगे।"
"Yes, Boss."
कॉल कट गई।
...
उधर...
पुरानी टेक्सटाइल मिल के अंदर...
धारा अब भी कुर्सी से बँधी हुई थी।
उसके हाथों पर रस्सियों के निशान पड़ चुके थे।
लेकिन उसकी आँखों में डर कम...
और गुस्सा ज़्यादा था।
तभी...
लोहे का भारी दरवाज़ा खुला।
इस बार अंदर सिर्फ़ एक आदमी नहीं...
बल्कि पाँच हथियारबंद लोग आए।
उनके बीचों-बीच...
एक लंबा आदमी धीरे-धीरे चलता हुआ अंदर आया।
उसने काला सूट पहन रखा था।
चेहरे पर चाँदी का मास्क था।
वह धारा के सामने आकर रुक गया।
"तो..."
उसने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
"तुम ही हो..."
"अर्णव शेखावत की सबसे बड़ी कमजोरी।"
धारा ने उसकी तरफ़ सीधा देखा।
"तुम गलत हो।"
"मेरा उनसे कोई रिश्ता नहीं है।"
वह आदमी हँस पड़ा।
"रिश्ता है या नहीं..."
"यह मुझे नहीं पता।"
"लेकिन..."
"जिस अर्णव ने कभी किसी के लिए अपनी राह नहीं बदली..."
"वह आज तुम्हारे लिए अकेला यहाँ आने वाला है।"
धारा की आँखें फैल गईं।
"नहीं..."
वह मन ही मन बोली,
"अर्णव.... मेरे लिए अपनी जान क्यों रिस्क में डाल रहे है. । "
...
उसी समय...
मिल के बाहर...
अर्णव की कार आकर रुकी।
उसने धीरे से घड़ी पर समय देखा।
रात के ठीक दस बजे थे।
वह कार से उतरा।
चारों तरफ़ सन्नाटा था।
अगले ही पल...
अँधेरे से दर्जनों लेज़र डॉट उसकी छाती और सिर पर आकर टिक गए।
छतों और खिड़कियों पर छिपे स्नाइपर...
उसी पर निशाना साधे हुए थे।
एक स्पीकर से भारी आवाज़ गूँजी—
"वेलकम, अर्णव।"
"तुम सच में अकेले आ गए।"
अर्णव ने चारों तरफ़ देखा...
और बिल्कुल सपाट आवाज़ में कहा—
"मैं आ गया।"
"अब धारा को छोड़ दो।"
दूसरी तरफ़ से ठहाका गूँजा।
"इतनी भी क्या जल्दी है?"
"पहले..."
"अपने हथियार नीचे फेंको।"
अर्णव ने बिना कुछ कहे...
धीरे-धीरे अपनी पिस्टल निकाली...
और ज़मीन पर फेंक दी।
स्नाइपर मुस्कुरा उठे।
स्पीकर से फिर आवाज़ आई—
"Good."
"अब अंदर आओ।"
अर्णव मिल के बड़े लोहे के दरवाज़े की ओर बढ़ने लगा।
लेकिन...
जिस बात से दुश्मन पूरी तरह अनजान था...
वह यह थी...
कि अर्णव ने कार से उतरने से पहले ही...
अपनी घड़ी में लगा एक गुप्त सिग्नल सक्रिय कर दिया था।
उसी सिग्नल के साथ...
आसमान में कई किलोमीटर दूर उड़ रहे माइक्रो ड्रोन...
बिना कोई आवाज़ किए मिल की ओर बढ़ चुके थे।
विक्टर की पूरी स्पेशल टीम...
अर्णव के एक इशारे का इंतज़ार कर रही थी।
अर्णव अकेला ज़रूर अंदर जा रहा था...
लेकिन...
वह कभी भी बिना आख़िरी चाल सोचे युद्ध नहीं लड़ता था।
उसने मिल का दरवाज़ा खोला...
और अँधेरे के भीतर कदम रख दिया।
उसे नहीं पता था...
कि अगले कुछ मिनटों में...
उसका सामना उस इंसान से होने वाला है...
जिसे वह पाँच साल पहले अपने हाथों से मौत के घाट उतार चुका था।
मिल का भारी लोहे का दरवाज़ा चरमराहट के साथ खुला।
अंदर घना अँधेरा था।
छत से लटकता एक अकेला पीला बल्ब बार-बार झिलमिला रहा था।
पूरे हॉल में जंग लगी मशीनें और टूटी हुई लोहे की चादरें बिखरी पड़ी थीं।
अर्णव के कदमों की आवाज़ पूरे हॉल में गूँज रही थी।
उसकी बर्फ़ जैसी नीली आँखें हर कोने का निरीक्षण कर रही थीं।
तभी...
उसकी नज़र सामने पड़ी।
धारा...
लोहे की कुर्सी से बँधी हुई थी।
उसके हाथ रस्सियों से कसकर बँधे थे।
माथे पर चोट का हल्का-सा निशान था।
बाल बिखरे हुए थे।
लेकिन उसकी आँखें अब भी हिम्मत से भरी थीं।
जैसे ही उसने अर्णव को देखा...
उसकी आँखों में राहत की चमक आ गई।
"अर्णव...!"
उसकी आवाज़ काँप गई।
लेकिन अगले ही पल वह ज़ोर से बोली—
"नहीं... यहाँ से चले जाओ!"
"यह जाल है!"
अर्णव के चेहरे पर कोई भाव नहीं आया।
उसकी नज़र सबसे पहले धारा के चेहरे पर गई...
फिर उसके हाथों पर पड़े रस्सियों के गहरे निशानों पर।
फिर उसके माथे की चोट पर।
बस इतना ही...
और उसकी आँखों की ठंडक अब और गहरी हो गई।
उसने धीमी आवाज़ में पूछा—
"उन्होंने तुम्हें मारा?"
धारा ने तुरंत सिर हिलाया।
"नहीं... तुम यहाँ से निकल जाओ।"
"उन्हें मेरी परवाह नहीं... उनका निशाना तुम हो।"
अर्णव ने उसकी बात जैसे सुनी ही नहीं।
उसने केवल इतना कहा—
"मैं आ गया हूँ।"
"अब तुम्हें कुछ नहीं होगा।"
उसकी आवाज़ में न कोई घबराहट थी...
न कोई जल्दबाज़ी...
सिर्फ़ अटूट विश्वास।
धारा न जाने क्यों...
उसकी बात सुनते ही शांत हो गई।
उसे पहली बार लगा...
कि जब तक अर्णव उसके सामने खड़ा है...
कोई उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
उसी पल...
पूरे हॉल में तालियों की आवाज़ गूँज उठी।
टक...
टक...
टक...
अँधेरे से वही चाँदी का मास्क पहने आदमी बाहर आया।
उसके पीछे तीस से ज़्यादा हथियारबंद लोग खड़े थे।
सभी की बंदूकें अर्णव की ओर तनी हुई थीं।
वह आदमी मुस्कुराया।
"कमाल है, अर्णव।"
"तुम सच में उसके लिए अकेले आ गए।"
अर्णव की नज़र एक पल के लिए भी उससे नहीं हटी।
उसने सपाट आवाज़ में कहा—
"उसे छोड़ दो।"
मास्क वाला आदमी हँसा।
"इतनी जल्दी?"
"इतने साल बाद मुलाकात हुई है..."
"थोड़ी बातें तो कर लो।"
उसने धीरे-धीरे अपना हाथ चेहरे की ओर बढ़ाया...
और अपना चाँदी का मास्क उतार दिया।
अगले ही पल...
अर्णव की नीली आँखें सिकुड़ गईं।
धारा ने भी उस आदमी का चेहरा देखा...
लेकिन वह उसे पहचान नहीं पाई।
वह आदमी मुस्कुराया।
"क्या हुआ, अर्णव?"
"पहचाना नहीं?"
कुछ सेकंड तक सन्नाटा छाया रहा।
फिर अर्णव के होंठों से एक नाम निकला—
"रुद्र..."
उस आदमी के होंठों पर और चौड़ी मुस्कान फैल गई।
"आख़िर याद आ ही गया।"
"तुमने पाँच साल पहले मुझे मरा हुआ समझ लिया था..."
"लेकिन मौत ने मुझे नहीं चुना..."
"मैं वापस आ गया, अर्णव।"
अर्णव की आँखों में अब केवल एक ही चीज़ थी...
ठंडा, नियंत्रित क्रोध।
उसने धीरे से कहा—
"उस दिन गलती हो गई थी।"
"इस बार..."
"कोई गलती नहीं होगी।"
रुद्र ज़ोर से हँस पड़ा।
"देखते हैं..."
"आज शिकारी कौन बनता है..."
"और शिकार कौन।"
लेकिन...
रुद्र यह नहीं जानता था...
कि अर्णव की घड़ी पर लगा छोटा-सा हरा संकेतक अभी-अभी जल उठा था।
इसका सिर्फ़ एक मतलब था—
विक्टर की टीम अपनी तय जगहों पर पहुँच चुकी थी।
अर्णव ने बिना अपनी नज़रें हटाए...
अपनी उँगलियाँ हल्के से मोड़ीं।
युद्ध शुरू होने में अब सिर्फ़ कुछ सेकंड बाकी थे।
रुद्र के होंठों पर खतरनाक मुस्कान थी।
"मार दो इसे!"
उसके आदेश के साथ ही...
पूरी मिल गोलियों की आवाज़ से गूँज उठी।
अर्णव बिजली की रफ्तार से एक लोहे के खंभे के पीछे पहुँचा।
उसी क्षण...
बाहर से धमाकों की आवाज़ आई।
धड़ाम!
मिल की टूटी खिड़कियों से विक्टर की स्पेशल टीम अंदर घुस चुकी थी।
चारों तरफ़ अफरा-तफरी मच गई।
गोलियों की बौछार शुरू हो गई।
अर्णव की नज़र सिर्फ़ एक इंसान पर थी...
रुद्र।
वह किसी तूफ़ान की तरह आगे बढ़ा।
जो भी उसके रास्ते में आया...
कुछ ही सेकंड में ज़मीन पर गिर गया।
रुद्र ने अर्णव पर गोली चलाई...
लेकिन अर्णव झुक गया।
अगले ही पल उसने रुद्र का हाथ पकड़कर इतनी ज़ोर से मोड़ा कि उसकी पिस्टल दूर जा गिरी।
दोनों के बीच ज़बरदस्त हाथापाई शुरू हो गई।
रुद्र पूरी ताकत से लड़ रहा था...
लेकिन अर्णव का हर वार पहले से कहीं ज़्यादा भारी था।
आख़िरकार...
अर्णव ने रुद्र को ज़ोरदार मुक्का मारकर लोहे की मशीन से दे मारा।
रुद्र के मुँह से खून निकल आया।
वह मुश्किल से खड़ा हो पाया।
अर्णव उसके सामने आकर रुका।
उसकी नीली आँखों में मौत उतर चुकी थी।
"पाँच साल पहले..."
"मैंने तुम्हें ज़िंदा छोड़कर गलती की थी।"
"आज..."
"वह गलती नहीं दोहराऊँगा।"
रुद्र ने आख़िरी बार अर्णव पर हमला करने की कोशिश की...
और हंसते हुए कहा तुम्हें क्या लगता है दुनिया इनका बहुत हूं हमारे boss बहुत ताकतवर है तुमसे भी ज्यादा और वह तुम्हें बहुत जल्द खत्म कर देंगे इतना कहकर वह जोर-जोर से हंसने लगा ।
लेकिन अगले ही पल...
धाँय!
एक गोली चली।
रुद्र वहीं ज़मीन पर गिर पड़ा।
उसकी आँखें खुली रह गईं।
उधर...
विक्टर ने धारा के हाथों की रस्सियाँ काट दीं।
लेकिन लंबे समय तक बेहोश रखने वाली दवा के असर से धारा पूरी तरह निढाल हो चुकी थी।
जैसे ही वह उठने की कोशिश करने लगी...
उसकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया।
"धारा!"
अर्णव बिजली की तेजी से उसके पास पहुँचा।
बेहोश होने से पहले धारा का सिर अर्णव के सीने से आ लगा।
उसने बिना एक पल गँवाए उसे अपनी बाँहों में उठा लिया।
उसकी साँसें चल रही थीं।
यही देखकर अर्णव ने राहत की एक धीमी साँस ली।
...
कुछ देर बाद...
काली रोल्स-रॉयस शेखावत मेंशन के मुख्य गेट पर आकर रुकी।
जैसे ही गाड़ी रुकी...
गौरी, शिव, पार्थ, वायु, आरोही और tara घर के बाकी सभी लोग दौड़ते हुए बाहर आए।
गौरी की आँखें रो-रोकर लाल हो चुकी थीं।
लेकिन अगले ही पल...
उन्होंने देखा...
अर्णव अपनी बाँहों में बेहोश धारा को उठाए हुए था।
उसने उसे इतने संभालकर पकड़ रखा था...
मानो वह दुनिया की सबसे कीमती चीज़ हो।
"धारा...!"
गौरी की आँखों से आँसू बह निकले।
अर्णव बिना कुछ बोले सीधे अंदर चला गया।
वह धारा को उसके कमरे में ले गया।
बहुत सावधानी से उसे बिस्तर पर लिटाया...
उसके सिर के नीचे तकिया ठीक किया...
और उसके चेहरे पर बिखरे बालों को धीरे से एक तरफ़ कर दिया।
इतने में फैमिली डॉक्टर भी पहुँच गए।
जाँच करने के बाद डॉक्टर मुस्कुराए।
"घबराने की कोई बात नहीं है।"
"इन्हें बेहोश करने वाली दवा दी गई थी।"
"कुछ घंटों की नींद के बाद ये बिल्कुल ठीक हो जाएँगी।"
यह सुनते ही पूरे परिवार ने राहत की साँस ली।
सबके जाने के बाद...
कमरे में सिर्फ़ अर्णव और धारा रह गए।
अर्णव कुछ पल तक चुपचाप उसे देखता रहा।
उसने बहुत धीरे से धारा का हाथ अपने हाथ में लिया।
उसकी ठंडी आवाज़ फुसफुसाहट में बदली—
क्यों आखिर क्यों मैंने तुम्हारे लिए अपनी जान को रिस्क में डाली मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा वह पूरी तरह से कंफ्यूज हो गया था ।
I know Kal boli thi bara chapter dugi or chota bhi nahi di mere ghar mai bin bulye mehan aage the to nahi de Pai ushke liye sorry per aaj ka chapter Sach mai bara hai ...
Ho ga to aaj raat tak 1 or chapter De dugi ...
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Radha Radha 🙏🙏🙏🙏🙏
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