
कुछ देर बाद...
अर्णव अपने कमरे में खड़ा था।
उसकी उंगलियों के बीच आधी जली हुई सिगरेट धीरे-धीरे सुलग रही थी। हर कश के साथ धुएँ की पतली लकीरें हवा में घुलती जा रही थीं।
वह कमरे की विशाल ग्लास वॉल के सामने बिल्कुल स्थिर खड़ा था।
सामने रात का अथाह अँधेरा फैला हुआ था, जहाँ दूर-दूर तक सिर्फ़ सन्नाटा था।
लेकिन अर्णव की बर्फ़-सी ठंडी, गहरी नीली आँखें उस अँधेरे को ऐसे देख रही थीं, मानो वह किसी इंसान को नहीं... बल्कि उसी अँधेरे से बातें कर रहा हो।
उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था।
न गुस्सा... न बेचैनी... न ही कोई डर...
सिर्फ़ एक खामोश ठंडापन।
ऐसा ठंडापन, जो किसी तूफ़ान के आने से ठीक पहले छा जाने वाली खामोशी जैसा था।
कमरे में सिर्फ़ घड़ी की टिक-टिक और सिगरेट की जलती राख की हल्की-सी आवाज़ गूँज रही थी।
अर्णव ने एक लंबा कश लिया, फिर बिना पलक झपकाए अँधेरे को देखते हुए धीरे से धुआँ बाहर छोड़ा।
उसकी नीली आँखों की चमक उस काली रात में और भी खतरनाक लग रही थी...
मानो वह अँधेरे को नहीं देख रहा था...
बल्कि अँधेरा ही उसकी आँखों में उतर आया हो।
टूट...
अचानक पूरे कमरे में काँच टूटने की तेज़ आवाज़ गूँज उठी।
बिना किसी चेतावनी के अर्णव ने पास रखा भारी फ्लावर वास पूरी ताकत से ग्लास वॉल पर दे मारा था।
फ्लावर वास फर्श पर गिरते ही अनगिनत टुकड़ों में बिखर गया।
मजबूत बुलेटप्रूफ ग्लास पूरी तरह तो नहीं टूटा, लेकिन उस पर मकड़ी के जाले जैसी गहरी दरारें फैल गईं। जहाँ वास टकराया था, वहाँ एक गहरा निशान उभर आया था।
अर्णव वहीं खड़ा था...
उसकी मुट्ठियाँ इतनी कस चुकी थीं कि उंगलियों की नसें साफ़ दिखाई दे रही थीं।
उसी वक्त बगल वाले कमरे में सो रहे पार्थ की नींद टूट गई।
वो जल्दी से बिस्तर से उठा और सीधे अर्णव के कमरे की ओर भागा।
दरवाज़ा खुलते ही उसकी नज़र सबसे पहले टूटी हुई ग्लास वॉल पर पड़ी।
फिर फर्श पर बिखरे फ्लावर वास के टुकड़ों पर...
और आखिर में अर्णव पर, जो अब भी उसी खामोशी के साथ सामने खड़ा था।
पार्थ ने एक गहरी साँस ली। उसके चेहरे पर झुंझलाहट भी थी और चिंता भी।
वह कुछ कदम आगे बढ़ा और गंभीर आवाज़ में बोला,
"ये क्या कर रहे हो, अर्णव?"
उसने टूटे हुए शीशे की तरफ़ इशारा किया।
"वो तो अच्छा है कि तुम्हारे कमरे के बगल में मेरा कमरा है और इस कमरे की आवाज़ सिर्फ़ वहीं तक जाती है... वरना तुम्हारी इन हरकतों से पूरा घर जाग जाता।"
कुछ पल रुककर उसने अर्णव की आँखों में देखते हुए पूछा,
"आख़िर तुम्हारे दिमाग़ में चल क्या रहा है? कब से देख रहा हूँ... तुम पहले जैसे नहीं रहे। बाहर से जितने शांत दिखते हो, अंदर उतना ही बड़ा तूफ़ान पल रहा है। आखिर बात क्या है, अर्णव?"
कमरे में फिर से सन्नाटा छा गया।
सिर्फ़ फर्श पर बिखरे काँच के टुकड़े और अर्णव की खामोशी... दोनों ही इस बात की गवाही दे रहे थे कि उसके भीतर कुछ ऐसा चल रहा था, जिसे वह किसी भी कीमत पर शब्दों में नहीं ढालना चाहता था।
अर्णव ने धीरे-धीरे अपना चेहरा पार्थ की ओर घुमाया।
उसकी बर्फ़-सी ठंडी नीली आँखों में कोई भावना नहीं थी... बस एक खतरनाक सन्नाटा था।
वह कुछ पल तक पार्थ को देखता रहा, फिर अपनी भारी आवाज़ में बोला—
"एक होटल में रूम बुक करो... और अभी के अभी मेरे कमरे में किसी को भेजो."
एक पल रुककर उसने अपनी नज़रें और ठंडी कर लीं। और बोला
"And I think... you know what I mean."
इतना कहकर वहो बिना पार्थ के जवाब का इंतज़ार किए उसके पास से गुज़र गया।
दरवाज़ा खुला...
और अगले ही पल उसके भारी कदमों की आवाज़ गलियारे में गूँजती हुई दूर होती चली गई।
कमरे में अब सिर्फ़ पार्थ रह गया था।
वो कुछ देर तक उसी दरवाज़े को देखता रहा, जहाँ से अर्णव अभी-अभी निकला था।
उसने गहरी साँस छोड़ी।
वो अच्छी तरह समझ चुका था कि अर्णव का इशारा किस ओर था... लेकिन उसके चेहरे पर संतोष नहीं, बल्कि चिंता साफ़ दिखाई दे रही थी।
उसने धीमे से अपना सिर हिलाया, मानो मन ही मन अर्णव के इस फैसले से असहमत हो।
फिर अपने कमरे में गया, बेडसाइड टेबल से अपना फोन उठाया और कुछ क्षण तक स्क्रीन को देखता रहा।
आख़िरकार उसने एक नंबर डायल किया।
कॉल जुड़ते ही उसने शांत लेकिन सख्त आवाज़ में कहा—
"एक प्राइवेट होटल सुइट अभी के अभी बुक करो... और बाकी इंतज़ाम भी वैसे ही होने चाहिए, जैसे हमेशा होते हैं। कोई गलती नहीं होनी चाहिए।"
सामने वाले ने "जी सर" कहकर कॉल काट दी।
पार्थ ने फोन नीचे रखा और थकी हुई नज़रों से खिड़की के बाहर देखने लगा।
उसके मन में बस एक ही ख्याल घूम रहा था—
" मुझे लगा था कि तुम यहां आकर और खास कर धारा को देखकर तुम वो सब नहीं करोगे और मैं गलत था । मुझे लगा था कि जिस तरह तुम धारा को देखते हो.... । "
इतना कहकर वो शांत हो गया । कुछ पल बात को सोने की कोशिश करने लगा पर उसे नींद नहीं आ रही थी ।
वहीं दूसरी तरफ...
अर्णव के फोन पर होटल की लोकेशन और सुइट की सारी डिटेल्स आ चुकी थीं।
उसने स्क्रीन पर एक नज़र डाली, फिर बिना किसी भाव के फोन लॉक कर दिया।
कुछ ही मिनटों बाद उसकी काली SUV सुनसान सड़कों को चीरती हुई तेज़ रफ्तार से होटल की ओर बढ़ रही थी।
स्टीयरिंग पर उसकी पकड़ इतनी कसी हुई थी कि उँगलियों की नसें साफ़ उभर आई थीं।
कार के अंदर गहरा सन्नाटा पसरा था।
न कोई संगीत...
न कोई कॉल...
सिर्फ़ इंजन की धीमी गूँज और अर्णव की भारी साँसें।
बाहर शहर की रोशनियाँ एक-एक कर पीछे छूटती जा रही थीं, लेकिन उसकी नज़रें सिर्फ़ सामने सड़क पर टिकी थीं।
उसका चेहरा हमेशा की तरह शांत था...
मगर उसके भीतर ऐसा तूफ़ान चल रहा था, जो किसी भी पल सब कुछ तबाह कर सकता था।
उसका मन बेचैन था। और ये बेचैनी उसे क्यों हो रही थी उसे खुद ही नहीं समझ में आ रहा था ।
हर बीतते पल के साथ उसकी उथल-पुथल बढ़ती जा रही थी।
मानो वो किसी चीज़ से भाग नहीं रहा था...
बल्कि अपने ही अंदर उठ रहे अँधेरे से लड़ रहा था।
उसने एक गहरी साँस ली और एक्सीलेटर पर पैर और ज़ोर से दबा दिया।
अगले ही पल काली SUV रात के अँधेरे को चीरती हुई और तेज़ रफ्तार से होटल की ओर दौड़ पड़ी।
कुछ देर बाद ,
अर्णव कुछ ही देर में होटल पहुँच चुका था।
लिफ्ट से सबसे ऊपर वाले फ्लोर पर जाकर वह अपने प्राइवेट सुइट के सामने रुका। कार्ड स्वाइप करते ही दरवाज़ा खुला।
कमरे के अंदर हल्की पीली रोशनी फैली हुई थी।
टेबल पर महंगी शराब की कई बोतलें और दो क्रिस्टल के ग्लास पहले से रखे थे।
कमरे में एक लड़की उसका इंतज़ार कर रही थी। उसने छोटे सफ़ेद रंग का शर्ट पहन रखा था और उसके चेहरे पर सेडक्टिव मुस्कान थी।
जैसे ही अर्णव अंदर आया, वहो मुस्कुराते हुए उसके करीब आई और उसके गाल को सेडक्टिव तरीके से छूने लगी
लेकिन अगले ही पल...
अर्णव ने झटके से उसका हाथ अपने चेहरे से दूर कर दिया।
अर्णव के ऐसा करने पर वो लड़की ने थोड़ा गुस्सा मे कहा
"ये क्या बदतमीज़ी है?"
अर्णव ने धीरे से उसकी तरफ़ देखा।
उसकी बर्फ़ जैसी ठंडी नीली आँखों में ऐसा सन्नाटा था कि लड़की के होंठ वहीं थम गए। वहो एक शब्द भी आगे नहीं बोल सकी।
अर्णव बिना कुछ कहे सोफ़े तक गया और थके हुए अंदाज़ में बैठ गया।
उसने अपनी शर्ट के ऊपर के दो-तीन बटन खोल दिए, जैसे साँस लेना भी उसके लिए भारी हो रहा हो।
फिर सामने रखी शराब की बोतल उठाई, ग्लास में डाली और एक ही घूँट में पी गया।
एक के बाद एक...
फिर दूसरा...
फिर तीसरा...
समय बीतता गया और ग्लास बार-बार भरता रहा।
कमरे में गहरा सन्नाटा था।
तभी वो लड़की फिर से एक बार उसके करीब आई और उसके गोद में बैठकर उसे फिर से बहुत ही सेडक्टिव तरीके से उसे शराब पिलाने लगी ।
अर्णव ने भी खुद को कंट्रोल में रखा और शराब पीने लगा धीरे-धीरे एक पैक दो पैक ना जाने ऐसे ही कितनी शराब उसने पिए ।
अब उसके ऊपर धीरे-धीरे नशा छाने लगा था । ये देखकर वो लड़की धीरे-धीरे उसके गले पर या फिर कभी चेस्ट पर किस करने लगी । वही अर्णव अपनी आंखें बंद कर कर लेटा हुआ था ।
तभी अचानक उसकी आंखों के सामने धारा की मासूम हंसता हुआ चेहरा घूमने लगा ।
अचानक ही उसने अपनी आंखें खोली और उस लड़की को दूर धकेल दिया । वो लड़की जो अर्णव के गले को किस करने में पूरी खाई हुई थी ।
अर्णव के चेस्ट पर बना हुआ समुद्र के बीचों बीच बना हुआ सार्क का टैटू देखकर जो पूरी तरह से मदहोश हो गई थी । और अब वो अर्णव को पूरी तरह से पा लेना चाहती थी ।
उसे ये अंदाजा ही नहीं था कि अर्णव ऐसा कुछ करेगा । जिस वजह से झटके से वो नीचे जमीन पर जा कर गिर गई ।
आप उसे बहुत ही ज्यादा गुस्सा आने लगा । पर वो अर्णव से कुछ कह भी नहीं सकती थी । वो उठ कर खड़ी हुई और उसे देखते हुए कुछ बोलने को हुई कि अर्णव उठा ।
उसने एक पल के लिए भी उस लड़की की तरफ़ नहीं देखा।
बस अपनी कार की चाबी उठाई और तेज़ कदमों से कमरे से बाहर निकल गया।
धड़ाम!
दरवाज़ा ज़ोर से बंद हुआ और पूरा सुइट फिर से सन्नाटे में डूब गया।
लड़की कुछ पल तक बंद दरवाज़े को देखती रह गई।
वो समझ ही नहीं पाई कि आखिर कुछ मिनट पहले तक चुपचाप बैठा अर्णव अचानक इस तरह बिना कुछ कहे क्यों चला गया।
उधर अर्णव तेज़ी से होटल के गलियारे से गुज़र रहा था।
उसके कानों में अब भी धारा की हँसी गूँज रही थी...
और जितना वो उस मासूम चेहरे को अपने मन से मिटाने की कोशिश कर रहा था...
उतनी ही गहराई से धारा उसकी यादों में उतरती जा रही थी।
वहीं होटल के सुइट में...
कमरे का दरवाज़ा बंद हो चुका था।
कुछ पल तक वो लड़की उसी बंद दरवाज़े को देखती रही, फिर धीरे-धीरे उसके होंठों पर एक रहस्यमयी मुस्कान फैल गई।
वह आराम से बेड के किनारे जाकर बैठ गई और अपनी उँगलियों से बेडशीट पर हल्के-हल्के निशान बनाते हुए मुस्कुराकर बोली—
"Ohh, Arnav... हाय..."
उसने हल्की हँसी हँसते हुए सिर झटक दिया।
"कितने हॉट हो तुम... लेकिन तुम्हारी ये बेरुख़ी मुझे बिल्कुल पसंद नहीं आई।"
उसने आईने में खुद को देखा और मुस्कुराई।
"तुमने मुझे... बॉलीवुड की स्टार, द क्वीन नंदिता को इस तरह नज़रअंदाज़ कर दिया?"
वो हल्के से हँसी।
"ये बात... नंदिता इतनी आसानी से भूलने वाली नहीं है।"
कुछ पल सोचने के बाद उसकी मुस्कान और गहरी हो गई।
"लगता है... पहली बार किसी ने मुझे ठुकराया है। और शायद... यही बात मुझे तुम्हारी तरफ़ खींच रही है।"
उसने धीरे से अपनी उँगलियों से बालों की लट कान के पीछे की और कहा—
"नंदिता का दिल अब तुम पर आ गया है, अर्णव। हम जब तक मैं तुम्हें पा ना लु। तब तक मैं भी हार मानने वाली नहीं हूँ।"
इतना कहकर वह ज़ोर से हँस पड़ी।
उसकी हँसी पूरे सुइट में गूँज उठी...।
वहीं दूसरी तरफ...
अर्णव वापस शेखावत मेंशन लौट चुका था।
उसके शरीर पर शराब का असर साफ़ था, लेकिन फिर भी उसके कदम ज़रा भी लड़खड़ा नहीं रहे थे।
वो हमेशा की तरह सीधा, और शांत दिखाई दे रहा था।
दरवाज़ा खोलकर वो धीरे-धीरे अंदर आया।
पूरे मेंशन में गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था।
घड़ी आधी रात पार कर चुकी थी।
हॉल की हल्की पीली रोशनी और दीवारों पर पड़ती परछाइयाँ ।
अर्णव बिना किसी की तरफ़ देखे सीढ़ियों की ओर बढ़ा।
उसकी बर्फ़ जैसी नीली आँखों में नशा तो था...
लेकिन उससे कहीं ज़्यादा बेचैनी थी।
सीढ़ियाँ चढ़ते हुए उसके कदम एक पल को भी नहीं डगमगाए।
ऊपर पहुँचकर वो कुछ time के लिए रुका।
सामने एक तरफ़ उसका अपना कमरा था...
लेकिन न जाने किस अनजानी खिंचाव ने उसके कदम दूसरी side में मोड़ दिए।
वो बिना कुछ सोचे धारा के कमरे की ओर चल पड़ा।
कुछ ही पलों में वह धारा के कमरे के दरवाज़े के सामने खड़ा था।
उसकी नज़रें उस बंद दरवाज़े पर टिक गईं...
अर्णव ने बेहद धीरे से दरवाज़े का हैंडल दबाया।
दरवाज़ा बिना कोई आवाज़ किए खुल गया।
वो शांत कदमों से कमरे के अंदर आया ।
कमरे में हल्की चाँदनी फैली हुई थी, जो कांच के खिड़की से अंदर आ रही थी।
सामने बड़े-से बेड पर धारा गहरी नींद में सो रही थी।
चाँद की दूधिया रोशनी उसके मासूम चेहरे पर बिखरी हुई थी, जिससे उसका चेहरा और भी शांत और सुंदर लग रहा था।
उसके लंबे, रेशमी बालों की कुछ लटें उसके गालों पर बिखरी थीं।
साँसों की धीमी लय के साथ वे लटें हल्के-हल्के हिल रही थीं।
उसने अपने पास रखे एक बड़े से टेडी बेयर को दोनों बाँहों में ऐसे समेट रखा था, मानो वह उसके लिए दुनिया की सबसे कीमती चीज़ हो।
उसके गुलाबी होंठों पर हल्की-सी मुस्कान थी...
जैसे वो कोई बहुत प्यारा सपना देख रही हो।
अर्णव वहीं दरवाज़े के पास खड़ा रह गया।
उसकी बर्फ़-सी ठंडी नीली आँखें पहली बार किसी को इतने गौर से देख रही थीं।
वो एक पल के लिए बस धारा को देखता रह गया।
उसके भीतर का सारा शोर...
सारी बेचैनी...
और मन का तूफ़ान...
जाने क्यों उस मासूम चेहरे को देखते ही धीरे-धीरे शांत होने लगा।
उसे खुद समझ नहीं आ रहा था कि ये वही लड़की है, जिसे वो अपने ख़यालों से निकाल फेंकना चाहता था...
फिर भी हर बार उसके कदम अनजाने में उसी तक चले आते थे।
कमरे में गहरा सन्नाटा था।
बस धारा की धीमी साँसों की आवाज़...
और अर्णव की खामोश नज़रें...
जो बिना पलक झपकाए उसी मासूम चेहरे पर टिकी हुई थीं।
अर्णव धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हुए धारा के बिस्तर के पास आ गया।
कुछ पल तक वो बस उसे खामोशी से देखता रहा।
फिर उसने बेहद अराम से अपना हाथ बढ़ाया और धारा के चेहरे पर बिखरी रेशमी बालों की लटों को कान के पीछे कर दिया।
उसकी उँगलियाँ धारा के गालों को छूकर गुज़रीं।
धारा नींद में ही हल्का-सा मुस्कुराई, लेकिन उसकी नींद नहीं टूटी।
अर्णव की नज़रें अब उसके चेहरे पर ठहर गई थीं।
वहो उसे ऐसे देख रहा था, मानो पहली बार किसी को इतनी शांति से देख रहा हो।
उसकी मासूमियत...
उसकी सादगी...
और उसके चेहरे पर फैली वह निश्छल मुस्कान...
सब कुछ अर्णव के भीतर चल रहे तूफ़ान को पल-पल शांत कर रहा था।
तभी उसकी नज़र धारा के हल्के गुलाबी होंठों पर जा ठहरी।
एक second के लिए उसके सख़्त चेहरे पर बेहद हल्की-सी मुस्कान उभर आई।
उसने धीमी, लगभग फुसफुसाहट जैसी आवाज़ में कहा—
"Pink dolphin..."
उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि मानो वो शब्द सिर्फ़ उसी के दिल तक पहुँचने के लिए निकले हों।
धारा अब भी गहरी नींद में थी, अपने टेडी बेयर को बाँहों में भरकर बेख़बर सो रही थी।
और अर्णव...
बस उसे देखे जा रहा था।
तभी ना जाने आज मैं उसको क्या हुआ वो झुका और धारा के होठों पर अपने होठ रख दिया । और उसे सॉफ्टली किस करने लगा ।
और वही धारा की पकर अपने टेडी बेयर पर कस गई ।
Aaj ke liye bass itna hi ...
Aage ki story bhut jada interesting hai ....
To skip maat karna ...
Or plz.. follow Karlijiye sab mujhe or rating bhi achi dijiye ga ...
Plz...
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Radha Radha 🙏🙏🙏🙏🙏
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